Sunday, February 8, 2026

आप संपन्न हैं

 आज एक ट्रेन पकड़नी है। उसके पहले कुछ मीटिंग्स भी हैं जो निपटानी है। रात सोए भी देर से क्योंकि कोई तो सिनेमा देख रहे थे। जो समझ आया देखने के बाद कि नहीं भी देखते तो चलता ही। पर शुरू करी तो पता चला इसके दो पार्ट हैं। फिर देखनी ही पड़ी। मतलब ऐसा कोई ज़ोर नहीं था। सोने से पहले एक बार आया कि बोल दूं आज वाली मीटिंग नहीं अटेंड कर पाऊंगा। फिर आज तो नहीं जाने का बहाना भी था, निकलने से पहले तमाम ज़रूरी ग़ैर ज़रूरी काम भी होते ही। लेकिन लगा कि क्या बहाना बनाना वैसे भी ये लोग काफ़ी स्पेस देते तो क्यों इनकी अच्छाई का फायदा उठाना। जुड़ जाओ घंटे डैड घंटे को और साथ साथ अपने काम निपटाते भी जाना, मीटिंग भी अटेंड करना, सुनना बोलना उसी हिसाब से। क्योंकि करने पर आओ तो चीजें हो ही जाती हैं और तरीके निकल ही आते। यही सोच समझ के हम मीटिंग में जुड़े। साथ में पराठा भी खाते चले।


बैग लगाते लगाते थोड़ा वक्त लगा। थोड़ी तो सर्दी हो भी रही थी और इतनी भी नहीं। जाना दो हफ्तों के लिए तो था भी यानी सर्दी आगे कम ही होनी थी। और जहां जा रहे वहां इतनी होती भी नहीं। लेकिन बैग भरते भरते थोड़ा भारी भी हो गया। ख़्याल आया कि लैपटॉप छोड़ ही जाते है। सुन ने के लिए ऑडियो कोर्ड मंगा लेते हैं। फिर भाई ने बताया अब सी केबल के ईयर फ़ोन भी आते। तो लगा यही मंगा लेते हैं, सुविधा रहेगी। बात करने में ही नहीं पर कोई मीटिंग अटेंड करने में, सुन ने में और फिर लैपटॉप नहीं ले जाना पड़ेगा क्योंकि फ़ोन से सारा काम हो ही जाएगा। तो यूं मंगाते मंगाते देखते दिखाते थोड़ा वक्त निकल गया और नहाने जाने में देरी हुई। बहरहाल, नहा धो कर खा पी कर हम निकले मेट्रो पकड़ने को। 


अगर चलते चलते जाओ तो मेट्रो स्टेशन हमारे घर से कुछ छह-सात मिनट की दूरी पर है । हमको लेकिन हमारे भाई ने गाड़ी से छोड़ दिया था। हां, थोड़ा गुस्सा भी किया था कि देर कर दी। पर फिर जब बताया गाड़ी दो-दस की तो उसने कहा हां टाइम है। हमको लेकिन लग रहा था कि दौड़ के पहुंचते हैं ऊपर और फ़टाफ़ट पकड़ते हैं मेट्रो। तो पहुंच भी गए प्लेटफार्म पर। पर मेट्रो के आने का कोई टाइम डिसप्ले नहीं हो रहा था। अमूमन कितनी देर में आनी अगली मेट्रो ये लिख के आता रहता। अब प्लेटफार्म पर भीड़ भड़ भी रही थी। हमने देखा दूर से मेट्रो आ तो रही। लेकिन दुबारा देखने पर पता चला कि रुकी हुई हैं। खैर जैसे तैसे वो आई और बड़ी धीरी गति से उसके दरवाज़े खुले। फिर उतनी ही धीरी गति से बंद भी हुए। और फिर धीरे धीरे वह चलना शुरू हुई।


अभी अगला ही स्टेशन पार हुआ था कि हम सोचने लगे कि इस ही गति से चली तो ट्रेन तो नहीं ही पकड़ पाएगी धन्नो आज। अमूमन जितना लगता उस से तीन गुना लग रहा था एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन जाने में। हमको हमारी एक दोस्त की याद भी आई, जिसने अभी हाल फिलहाल में एकदम तूफ़ानी स्पीड में दौड़ते हुए, आंधी की तरह अपनी लगभग जा चुकी ट्रेन को आख़िरी लम्हों में पकड़ लिया था। और फिर ख़्याल आया कि “भाई वो तो तेज गति की धावक हैं (और सब ही कुछ सरपट कर लेती), और तुम? अरे तुम ठहरे लांग डिस्टेंस रनर, इतने स्टैमिना का करोगे क्या मियां क्योंकि यहां तो स्प्रिंट लगना”। तभी हनुमान सेतु मंदिर गुजरा और हम बोले, “जय बजरंग बली, बस दो बजे से पहले पहुंचा देना”।


आख़िरकार मेट्रो पहुंची ही स्टेशन दो बजने को दो मिनट पर। हम बैग लिए अपना दौड़े ये बताते हुए खुद को कि नहीं भाई स्टैमिना काम आ ही जाएगा, आंख बंद कर दौड़ो। खैर दौड़े तो नहीं पर हां तेज़ तेज़ चलते हुए अपने डब्बे तक पहुंचे। बैठे ही थे कि ट्रेन चली लेकिन फ़िर रुक गई और दस मिनट बाद चली। जब तलक हम घर फोन कर बता दिए कि बैठ गए और एक दोस्त से भी ये पूरी दौड़ की गाथा सुनाई।


ट्रेन में हमारी सीट साइड अपर की थी। हम लेकिन नीचे ही बैठ गए क्योंकि ख़ाली थी। कोई चढ़ा नहीं था अभी तक तो हम को लगा चलो ये भी सही। कानपुर आया कुछ डेढ़ दो घंटे बाद। आया तो मैं बोला कोई न चढ़े तो बेहतर ही वरना तो क्या ही। फिर कोई आया सीट का नंबर देखते हुए और बोला फोर्टी सेवन और हमसे पूछा आपकी? जिस पर मैने ज़वाब दिया हां ऊपर वाली आप बैठो इधर अभी कहां सोना। पर वो हमसे हमारा फ़ोन नंबर मांग रहे थे। थोड़ा तो जल्दी में भी थे क्योंकि इधर ट्रेन 5 मिनिट रुकती। उनको नहीं उनके पिताजी को जाना था, कटनी तक। अब क्योंकि हमारे इर्द गिर्द इतना फ्रॉड फैला हुआ कि कोई नंबर मांगे तो डर ही लगता और पहला भाव ही यही की चोरी करेगा। पर फिर सच्चाई का एहसास हुआ कि क्या ही चोरी करेगा हमारे अकाउंट से क्योंकि उतने तो पैसे भी नहीं। इस पर ये भी की वो बोल रहे थे कि “पिताजी को कटनी उतार देना आप, थोड़ा ऊंचा सुनते और थोड़ी परेशानी भी है। क्योंकि वो फ़ोन नहीं रखते तो कुछ ज़रूरत हुई तो मुझको ही कॉल करेंगे”। ख़ैर इतना सब सुन के हमने नंबर दे ही दिया जिसका मन हम थोड़े देर पहले बना ही लिए थे। ट्रेन भडी और वह उतरे और सीट पर अंकल जी बैठे।


अंकल जी बताए कि वह कटनी जा रहे, रात में आयेगा ग्यारह बजे तो उसके पंद्रह एक मिनिट पहले उठा देना होगा उनको। जैसा कि उनके बेटे ने बताया था नंबर लेते वक्त कि थोड़ा ऊंचा सुनते तो अंकल जी ज़ोर से ही बोल रे थे। बातचीत खुद ही आगे बढ़ाते हुए वह बताने लगे कि क्यों जा रहे कटनी। तो हुआ यूं था कि उनकी बहन कोमा में चली गई तो उसके चलते उनको टिकट करा के जाना पड़ा। मैने ओह-हो किया ही था कि अंकल जी ने आगे बताया कि होश में आ भी गई कल पर अब टिकट हो ही गया था तो सोचा मिल ही लूं क्या पता आगे वक्त हो न हो। अभी मैं आह कर रहा था क्योंकि कोमा में जाना तो गंभीर ही चीज़ और बढ़िया तो बात ये भी की होश आ गया पांच दिन में। अंकल जी से जब पूछा तो वो बताए कि उनसे दो ही साल छोटी हैं बहन और वे इक्कयासी साल के।


जब मैंने बोला कि उनको लेटना तो लेट जाए तो अंकल जी ने बोला अभी तो बैठे ही। फ़िर अपने बांएं टांग कि तरफ़ इशारा करते हुए बताया कि ये पैर काम नहीं करता। ऊपर से हड्डी टूट गई थी तो ये इसमें जान नहीं है गोंद से चिपका हुआ। आगे बताते थे वह कि दो ही हड्डी ऐसी, एक गर्दन वाली जो टूटती तो बहुत कम ही बचता इंसान। दूसरी ये। क्योंकि शब्द कम आ रहे थे तो थोड़े से वक्त के बाद मैने पूछा “कैसे”! तो अंकल जी बताए कि बस ऐसे ही टूट गया। “कोई टक्कर नहीं, ठोकर नहीं बस ज़मीन पर फ़िसला और दो भाग में। कुछ चूना (अभी वे चुटकी भर का इशारा कर रहे थे) हटाया फर्श से फ़िर पता नि पैर गीला था या भगवान जाने क्या बस गिरा नीचे और दो भाग में”। एक गहरी सांस लेने के बाद मैं पूछा उनसे, “कब हुआ?” उन्होंने तुरंत ज़वाब दिया कि “पैंतालीस साल पहले”।


पैंतालीस साल! यानी कि उनकी आधी उम्र से ज्यादा समय। यानी मेरी जितनी ज़िन्दगी गुज़री अभी तक उस से भी ज़्यादा। अंकल जी आगे बताते गए अपने घर की दास्तां। कैसे मुश्किल हुई लेकिन बेटियां सब अच्छे घर में ब्याह कराई। एक लड़की इंटेल में डायरेक्टर, अमेरिका में। दूसरी बेटी कहीं और बेटा जो साथ आया वह भी कुशल। सब अच्छे से हुआ। एक पैसा नहीं दिया ऊपर का। वे ये भी बताए कि कैसे वो अमेरिका हो आए तीन बार। बच्चों ने ही बुला भेजा। एक बार तो छह महीने रुके। इस बार जल्दी आ गए क्योंकि बेटा आ रहा था वरना वहां बिटिया तो कह ही रही थी रुकने को। 


अंकल जी ये सब बता रहे थे जब तो मेरे ज़ेहन में पैंतालीस साल का फिगर ही घूम रहा था। इतना लंबे अर्से से इनका पैर ख़राब और ये इतनी ज़िंदादिली से जी रहे बिना किसी शिकवा के। इस उम्र में ट्रैवल भी कर रहे, अकेले वो भी। ग़ज़ब है! और मैं सुबह से, नींद, मीटिंग कैसे अटेंड करूं, बैग का भार, सर्दी गर्मी के कपड़े, ट्रेन और रफ़्तार और लंबी दौड़ जैसी चीज़ों में उलझा हुआ। और यहां ये शख़्स तमाम ज़िन्दगी पूरी ज़िंदगानी लुटा के जिए जा रहा। अभी भी मिलने जा रहा अपनी छोटी बहन को क्योंकि मिलना ज़रूरी। जाना है तो बस जाना है। क्योंकि कुछ काम तो तुम्हारे खुद के हिस्से के जो कि करने ही, करने के रस्ते ढूंढो न करने के बहाने नहीं। क्योंकि आप तो संपन्न है मियां इधर उधर देखो तो लोग कितनी आसानी से कितनी परेशानी को जिए ले रहे।


अंकल लेट गए थे और मुझसे बोल कि उधर ही बैठा रहूं उनको कोई तकलीफ़ नहीं। वह बाथरूम जाने को भी कई बार उठे। लेकिन मज़ाल कि कोई मदद ली हो। खुद ही धीरे धीरे पकड़ते पकड़ते गए, आए और फिर लेट गए। मैं खाना खाने को लगा और पूछा उनसे तो बताया उन्होंने कि रखा हुआ लेकिन वह खायेगे नहीं। मैं फ़िर ऊपर इत्मीनान से बैठ गया सोचते हुए कि अकेले कैसे करने दे रहे ट्रैवल इनको? फ़िर ख़्याल आया कि ये तो मैं इनको पहली बार देख रहा हूं। इन्होंने तो कितनी ही यात्राएं यूं कर ली होंगी। खुद पर विश्वास भी होगा और घर वालों को भी पता होगा कि उनके पिता जी कर ले जायेगे। 


कटनी आने से पहले मैं नीचे ही आ कर बैठ गया था। अंकल जी पहले से ही बैठे हुए थे। थोड़ी देर बाद बोले कि उनके भांजे को फ़ोन लगा के बता दूं कि वे आने वाले, तो स्टेशन आ जाए। और ये भी बोले कि अगर वह नहीं आएगा तो खुद चले जायेगे वो, बस वो सीढ़ियां है जो चल के इस पार से उस पार जानी। थोड़ी दिक्कत होती पर कर लेंगे अकेले ही, अगर कोई नहीं आ पा रहा होगा। अपनी छोटी सी नोटपैड नुमा डायरी से जब वह नंबर निकाल रहे थे तो एकाएक एक नंबर देख मुझे दिखा कर बताए ये वही अमेरिका में इंटेल में डायरेक्टर बेटी उनकी। मैं उनको इशारे से बताते भी चला कि थोड़ी दस एक मिनट लेट भी चल री ट्रेन और भांजा उनका ऑलरेडी प्लेटफार्म पर पहुंच गया।


अंकल को छोड़ने को बाहर तक गया। उनके भांजे ने मेरे हाथों से समान पकड़ा। लेकिन अंकल उतरे अपने आप से, धीरे धीरे एक एक सीढ़ी। पूछने पर वहीं ज़वाब कि “ये हो जाएगा”। उन्होंने धन्यवाद कहा और भांजे से ये भी बोले कि ये बड़े सज्जन इंसान रास्ते भर हाल पूछते रहे। मैं उनका आशीर्वाद ले कर वापस अंदर चढ़ा। अपनी सीट पर बैठ बड़ी देर तक ख़ामोश मै सोचता रहा कि अंकल भी कमाल के कि मुझे नेक कह रहे। जबकि वे खुद इतने प्रेरणा, हिम्मती, और स्वाभिमानिता के साथ साथ प्रबल इच्छाशक्ति के प्रतीत। अपने सूखे आंसू पूछते हुए मेरे मुंह से फ़िर बस इतना हीं निकला कि, “आप संपन्न हैं”!


(यह ब्लॉग मृगेंद्र सिंह द्वारा लिखा गया है, उस दिन की एक छोटी-सी मगर गहरी घटना से निकली कहानी।)

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