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Saturday, August 10, 2024

बीज बचाओ आंदोलन के अग्रणी विजय जरधारी जी से सीधी बातचीत

"पेड़-पौधों और नदियों को यदि मानव जीवन का मूल आधार कहा जाए तो शायद इसमें कोई अतिशयोक्ति न हो; पेड़-पौधों से हमें सांस लेने हेतु प्राण वायु, ऊर्जा हेतु भोजन और दैनिक जरूरतों के तमाम उत्पाद प्राप्त होते हैं और नदियों से हमें जल प्राप्त होता है।" 


उत्तराखंड भारत के उन राज्यों में से है जो प्राकृतिक संपदा से अत्यंत धनी हैं, यहां विभिन्न प्रजातियों के पेड़ -पौधों से बने जंगल फलते फूलते हैं , नदियां लहलहाती हैं ;  यहां के जंगलों में अनेक गीत गूंजते हैं , जंगलों से मानव जीवन पुष्पित होता है लेकिन बीते समय में कई ऐसे मौके आए जब इन जंगलों से नारे और शोर गूंजने लगे थे , इनकी रक्षा और सुनियोजित उपयोग के पक्ष में लगे नारे !

देश की आजादी के बाद उत्तराखंड के बड़े भूभाग में फैला चिपको आंदोलन यहां के समाज की एक ऐसी ही अभिव्यक्ति या शोर था, 70 के दशक में शुरू हुआ यह आंदोलन इस क्षेत्र के निवासियों के जंगलों से दैनिक उपयोग के उत्पादों को लेने की मनाही से शुरू हुआ था ; गोपेश्वर , मंडल , फाटा से फैला यह आंदोलन धीरे-धीरे यहां के जनमानस के बीच बैठ गया , फिर तो जहां-जहां भी लोगों के अधिकारों पर बात आई, वहां-वहां विरोध के स्वर घूमने लगे ।

इस आंदोलन को अंकुरित करने और दिशा देने में चंडी प्रसाद भट्ट , आलम सिंह बिष्ट, गोविंद सिंह रावत , गौरा देवी, सुंदरलाल बहुगुणा, कुंवर प्रसून, विजय गिरधारी , शमशेर सिंह बिष्ट,  गिरीश तिवारी गिर्दा और अन्य व्यक्तियों का योगदान रहा ; जब यह आंदोलन जनमानस के भीतर बैठ गया फिर तो समाज का लगभग हर समूह इससे जुड़ने लगा और यहां के जनमानस ने यह साबित कर दिया कि जंगलों के भीतर से यदि मधुर गीत पनप सकते हैं तो गहरे शोर भी निकल सकते हैं।1980 व इसके कुछ समय पश्चात तक चिपको आंदोलन अपने उद्देश्यों तक पहुंचने में लगभग सफल रहा , तत्पश्चात चिपको का ताप पाए अनेक व्यक्तियों ने समाज के अन्य पहलुओं पर विश्लेषणात्मक तरीके से सोचना और रचनात्मक कार्य करना शुरू किया , इनमें से ही एक प्रकार का रचनात्मक कार्य था बीज बचाओ आंदोलन ।

The Option

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