Wednesday, January 28, 2026

चीज़ें एकाकी में नहीं होती।


कहने को तो बस एक फोन आता है और फिर कुछ लोग और जुड़ते हैं। बातचीत शुरू होती है और कहा जाता है आपके लिए एक नया फोन लेते हैं, आपको काम आएगा।


हम जानते हैं कि हां मौजूदा फोन के दिन उतने नहीं बचे हैं, रातें तो और भी कम रह गई हैं इसकी। लेकिन आगे बातचीत उधर से हो रही होती है क्यों ले लेना चाहिए और इधर से क्या ही करना अभी चल जाएगा काम। डोर महज़ इतनी सी है और इसी में खींच, इसी में तान और इसी में खींचतान।


बड़ा रोचक द्वंद है जो आगे की बातचीत के समांतर पीछे पीछे चल रहा होता है। कुछ पुरानी बातें, कुछ पुरानी यादें और कुछ पुराने किस्से, तज़ुबों के साथ। आगे तो हम कह रहे हैं नहीं लेना पीछे सवाल आता है और आता ही रहता है क्यों नहीं लेना। जितनी बार उधर से दलील आती उतनी बार थोड़ा समझते लेकिन ज़्यादा ज़ोर इसी पर की अभी ज़रूरत नहीं, शायद उतनी नहीं इतनी नहीं कितनी नहीं। दलील, पहली बार से आखिर बार तक वाजिब ही आती हैं सारी। कुछ हद तक सहमति भी बनती। हम हांजी हांजी, ह्म्म्म, हां भी कहते। और फिर साथ ही हां लेकिन नहीं भी लेंगे तो चलेगा भी बोलते चलते। हर बार थोड़ा हल्का, थोड़ा कम, थोड़ा महीन, लेकिन फिर भी धीमी ही आवाज़ में बोलते ही चलते। गहरी सांस तो नहीं लेते उतनी लेकिन आगे से ज़्यादा पीछे वाले सवाल-ज़वाब ज़रूर चुभते रहते।


सवाल आता है क्यों नहीं लेना फोन, क्योंकि वो दिला रहे? सीधा स्पष्ट और चुभता हुआ सवाल। ज़वाब सरल ही होना चाहिए पर है नहीं। क्योंकि ज़वाब आता है कि नहीं ऐसा नहीं, जिस पर फिर तपाक सवाल आता है कि फिर कैसा है और ज़वाब आता है, मतलब ऐसा “भी” नहीं है।


अरे भाई तो है कैसा बताओ तो। मतलब कोई दिला रहा ये तकलीफ़, वो लोग खरीद कर दे रहे ये तकलीफ़? वो दिलाए या तुम्हारे कोई और खासम ख़ास खरीदवा दे क्या ही फ़र्क?


नहीं मतलब बात तो यही न कि कोई क्यों दिलाए हम खुद ले लेंगे जब लेना होगा।


हां नहीं बिल्कुल ही सही बात आप ले लेंगे जब लेना होगा आपको। पर अगर अभी ले लेंगे तो क्या उन्नीस बीस पच्चीस हो जायेगा तुम्हारा? चलो ठीक ये भी मान लिया कि वो तुम्हारे दिलो-दिलदार नहीं, हमदम नहीं हमराज़ नहीं। पर दोस्त, हमराही, साथी तो मान ही ले की हैं वह की वो भी नहीं? नहीं मतलब दोस्त तो हैं वो ऐसी बात नहीं। अच्छे बुरे जैसे हैं अब यही दोस्त हैं, काफी यात्रा पिछले तीन एक साल में कर भी ली है।


तो बड़े भाई दिक्कत क्या है?


नहीं मतलब बेकार बोझ क्यों बन ना, नहीं? अभी तमाम और भी खर्चे होने तो उधर ध्यान दें हमारा तो चल ही रहा फोन। और फिर फोन ऐसे थोड़े ही लेते। लेने के लिए पहले बजट देखते अपना, क्या ज़रूरत कितनी की आवश्यकता और फिर हाथ में कैसा आता। हाथ में आ भी रहा कि बाहर भागे जा रहा। जेब में कैसा अटकता, इधर वाली, पीछे वाली नीचे ऊपर वाली जेबों में। ये सब तमाम चीजें भी तो देखनी ही पड़ती। अब यही फोन देख लो जो कि बहन दे गई थी और उसके देने के साल भर बाद ही इसको यूज करना शुरू किया था। जब कि वो पिछला फोन भी कगार पर था बिगड़ने के।


और हां हमारा खुद का बजट तो है नहीं अभी लेने का तो कहां से लें। होता तो उस हिसाब से विचार करते, पसंद करते, देखते समझते। देखो न अगर सही से तो खुद से चीज़ें लेने वाली बात नहीं सिर्फ पर एक खुद के चुनाव, फ़ैसलों वाली बात भी। आपकी हर चीज जो आपके इर्द गिर्द वो आपकी कहानी कह रही होती कि ये साब जी ये हुज़ूर ये शख्शियत है इनकी। तो यहां हाथ बंधे होने से वो तसल्ली तो नहीं आएगी।


याद करो जब वो पीले रंग का हेलमेट लिया था साइकिल के लिए। क्यों वो पीला ही लिया गया था जबकि रंग तमाम थे और प्रोवेल का ही क्यों क्योंकि थे तो और भी ब्रांड। बड़ा सरल था चुनाव। एक तो प्रोवेल का हेलमेट हमारें बड़े अज़ीज़ दोस्त साब इस्तेमाल करते थे। और पीले रंग की जर्सी टूर दी फ्रांस में सबसे आगे चलने वाले साइक्लिस्ट को पहनाई जाती। 


जिस साइकिल से बैंगलोर से लखनऊ की यात्रा करी गई उसको लेने के पहले उस स्टोर पर उसी ब्रांड और मॉडल वाली साइकिल को तकरीबन डेढ़ दो घंटा चलाया गया था। फिर जा कर दूसरे स्टोर से नई ली गई थी।


या फिर वो दस हज़ार का जूता। जो था तो बारह का मिला ग्यारह हज़ार से कुछ कम का। कितनी मशक्कत की गई थी ढूंढने की उसको। फिर मिला जब तो मुम्बई की उस दुकान में एक घंटा पहने बैठे, चलते और दौड़ते रहे थे। सेल्स गर्ल से कहा था कि वह बेचे न प्रचार करें हमको मालूम इसकी हकीक़त, आप बस बताए आपकी ड्यूटी कितने बजे तक। बस उसके पहले हम काउंटर पर आ कर रसीद कटा लेंगे। और यही किया भी था।


हां ये सभी बातें सही हैं और पूरी तरह सहमति है। पर चलो तुम यह मान लो कि संस्था के नाम से लेते हैं।


आगे फोन पर दलील आती की संस्था का तो अलग ले लेंगे, ये वाला आप लो। हम थोड़ा अकर मकर के कहते हैं चलो ठीक है।


जभी हम यह कह रहे होते आगे तो पीछे भी बातचीत हो रही होती कि हां कहना भी ठीक है। पर हां तुम कह क्यों रहे हो?


देखो, हमको तो पता ही हमारे बारे में। ये लोग शायद इतना नहीं जानते। तो हां कहना इसलिए भी ठीक की तुम रेजिड नहीं हो। नए विचारों को स्वीकार करते हो। अरे पर ये तो हम जानते ही। बिल्कुल जानते हो। पर ये लोग को इतनी डिटेल में नहीं पता ना तुम्हारे बारे में। और फिर हम सबको इतना दृढ़ होने की भी ज़रूरत नहीं। बादलव और नई चीजों का अपने अंदर लेते रहना भी अहम है। तो हां कह के ये दिखाना है? नहीं, ये “भी” दिखाना है।




फोन रखने के बाद जब हम धूप में बैठ अपनी नियमित काली कॉफी पीते थे तो एक ख़्याल और आता है इन सभी बातचीत को सोचने के बाद। कि घर पर क्या बताओगे? घर पर नही सोचेगा कोई, नहीं बोलेगा कोई? हां। लेकिन सहमति तो यही बनी न कि हम मानते चलते की ये संस्था ही दिला रही क्योंकि ज़रूरत भी। क्या क्यों कैसे की जिम्मेदारी भी उनकी।


और हां अगर तो तुमको लग रहा कि फोन नहीं लेने से तुम कुछ बचत कर रहे। के सादगी में जीते हैं जी, जितना है उतने में संतुष्ट। तो देखो ये भी भ्रम है। कौन रोक रहा तुमको कमाने से? कमाओ और लो जितना जो भी जैसे लेना। किसी ने रोका हुआ मेहनत करने से। अरे बेचो जो भी हुनर अकल समझ है। पर यूं सादगी का चोला न ओड के चलो कि उसमें आलस और निकम्मेपन की बू आए। मतलब फोन टूटे जा रहा चप्पल घिसे जा री। लेकिन हुज़ूर ने मेहनत और कमाने के जरिए नहीं ढूंढने हां बहाने ही सही, अभी ठीक है, चल तो रहा है काम, चल जाएगा


चीज़ें एकाकी में नहीं होती। उनके आगे पीछे तमाम सी चीजें चलती फिरती रहती। कहने को तो बस एक फोन कॉल था।


(यह ब्लॉग मृगेंद्र सिंह द्वारा लिखा गया है, उस दिन की एक छोटी-सी मगर गहरी घटना से निकली कहानी।)

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