Saturday, May 10, 2025

तुम कहानियां कैसे सुनाओगे!!

सुबह होती है, आप उठते हैं रोज के हिसाब से उठने में देर हुई, क्यूंकि  रात  देर बातचीत हुई। काफी सही काफी गलत हुई पर फिर भी हुई। दिन के चार काम हैं जो करने को हैं तो आप दिन बांधते हो। नाश्ते का हिसाब हो गया है क्यूंकि उधर कहीं पड़ोसी ने पोहा बनाया है और आपसे आग्रह किया गया है कि आप जरूर आयें जो की सही भी है जाना भी चाहिए ही और बुलावे में भी अपना प्रेम है एक।  

कुछ पन्ने हैं जो भरने हैं, काफी लिखा जाना बाकी है। रिफ्लेक्शन यहीं का यहीं रह के जाना है साथ नहीं ले जाना है ये आपने सोचा हुआ है।  शायद थोड़ी ज़िद्द भी है।  लेकिन हिसाब यही है जो तय किया है। आप लिखते हो।  

कुछ किताबें हैं जो मेज़ पर रक्खी हैं। वह कहीं पहुचानी है, स्कूल से विदा लेना है, मिल के सब से आना भी है। आप अभी गांव में हैं पिछले कई रोज़ से। तो विदा तो गाओं वालों से भी लेना है गांव से भी। कैसे लोगे ये सवाल भी है और कस्मकश भी।  

डक्कोटोला गांव की तरफ जाती हुई सड़क  

सुबह वाली बस नहीं लेनी है, बारह बजे वाली के बारें में सोचते हैं। सोच ही रहे है की लिखते लिखते काफी वक़्त  निकल जाता है।  और अभी कुछ बच्चें हैं जो आते हैं, कुछ सवाल कुछ जवाब मांगते हैं। आप कहते हो मेरे दोस्त अंटोनी की शादी है उसमे अब दिल्ली जाना है। उनमें से एक कहता है, शायद समझा रहा दूसरों को, "मार्क अंटोनी मूवी" आप अब अंदर आते हो और लिखने बैठ जाते हो कि ख्याल आता है कुछ कॉफ़ी है, थोड़ी भिंडी है खा कर चलते हैं। चलते हैं चिलहाटी तक, चिलहाटी जो डक्कोटोला से कुछ दो किलोमीटर है। तो चिलहाटी तक पैदल ही चलते हैं।  

विदा कहने का ये तरीका सही है पर क्यों ही है? सवाल पूछते है लोग जब आप मिलते हो। आप कहते हो की देखा आपने कैसे खेत में माताएं कितना काम कर रही, धान को काट रही, अपने कंधे पर बॉस के सहारे से लाद कर चल रही। फिर घर कर खाना भी पका रही घर भी संभाल रही समाज भी और खुद को भी संभाल रही।  तो बस वही प्रेरणा है हमको तो बस कुछ दूर एक बस्ता ही लाद ले जाना है।  

चिलहाटी में चाय की दुकान 

आप स्कूल से विदा ले कर गांव होते हुए चिलहाटी चाय दूकान पहुंचते हो। पर अब ख्याल आता है की चलो चौकी तक ही पैदल चल लें।  अम्बागढ़ चौकी कुछ पंद्रह सोलह किलोमीटर दूर है। बैग भारी है, धुप तेज है, आप फिर चलते हो।

चलते हुए और लोग मिलते हैं। वो फिर वही पूछते हैं, आप बताते हो। उनमे से एक कहता है की आप तो बहुत चलते हो। आप चौंक जाते हो और पूछ लेते हो की उनको कैसे पता? वह कहतें आपने देखा नहीं हमने देखा भाई आपको चलते हुए रात में तो कभी सुबह तो कभी यूं ही। आप मुस्कुराते हो और खुद से कहते हो हाँ देखा तो माताओं ने भी नहीं हमें उनको देखते हुए।  

लम्बी बातचीत है क्यों कर रहे क्या कर रहे कितनी दूर सोच रे। आप बोलते हो हाँ बस पेट भर का मिल जाए इतना ही चाहिए। लोग लोगों पर विस्वाश करें ये जरूरी है। फिर किसी के हाथ में पानी का कटोरा है, आप देखते हो और कहते हो पानी माँगा हमने आपने दे दिया और हमने पी भी लिया। इसमें कुछ मिलाया है की नहीं सही गलत क्या ही बस पी लिया। आपने भी दे दिया पानी क्यूंकि आपके पास था और किसी ने माँगा था। तो बस इतना ही है हर मानव और बस इतना ही सरल भी। 

जाते जाते वह कहते खाना खा लो। आप बोलते धुप चढ़ रही निकलना है पर मगर शुक्रिया। हाँ बात ये भी होती की राजनंदगाव जाए पैदल ? जानवर तो नहीं हैं ? वो कहते हाँ जा सकते हो और आप सोचते हैं।    

सड़क खाली है। दूर तक कोई भी नहीं है। आप हो, आपके गीत हैं, कुछ ख्याल हैं चन्द सवाल हैं और काफी बवाल हैं। हिसाब लगता है चलने का और लगता तो है की हाँ हो जाएगा बस रात ही होगी। कंधो में दर्द हो रहा है आपको मालूम मोजा फट रहा लेकिन दो और रखें हैं शायद चल ही जाए सत्तर किलोमीटर राजनंदगाव तक।  

आप अम्बागढ़ चौकी पहुंच जाते हो चलते हुए और बस इसी वक़्त वही लोग वापस जा रहे जिन्होंने रास्ते में बात की थी थोड़ा पानी पिया था साथ में किस्से और चर्चे हुए थे। आप रुकते हैं और बस पकड़ते है। ख्याल आता है की हाँ हो तो जाता राज नंदगाव भी पर थक जाते। और समझ आता है मसला कहानी का नहीं कैसे का भी नहीं। सवाल तो ये है अब, की, कहो गे कब!

मुद्दा तो यही है की यही सब करोगे तो तुम कहानियां कब सुनाओगे!!

(यह ब्लॉग मृगेंद्र सिंह द्वारा लिखा गया है, जब वह पिपिलितारा में अपनी यात्रा के दौरान डक्कोटोला, छत्तीसगढ़ में थे। यह उस समय का दस्तावेज़ है, जहाँ रास्ते की खामोशी, गाँव की जीवंतता, और हर कदम पर उभरती छोटी-छोटी कहानियाँ उनकी साथी बनीं।)

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